विश्वप्रसिद्ध घाटा मेहंदीपुर श्री बालाजी महाराज के बाल स्वरूप का वर्णन एक अत्यंत श्रद्धापूर्ण और भावनात्मक अनुभव को दर्शाता है। श्री बालाजी महाराज का यह स्वरूप श्रद्धा, शक्ति, करुणा एवं ममत्व का अद्वितीय संगम है। मंदिर में शोभायमान श्री बालाजी की आँखों में न्याय का तेज, चेहरे पर दयालुता और मुद्रा में पराक्रम स्पष्ट झलकता है। उनके इस जागृत स्वभाव से प्रतीत होता है कि वे प्रत्येक भक्त के हृदय की पीड़ा को पढ़ रहे हैं।
ऐसा लगता है जैसे प्रभु अपनी चेतन शक्ति से भक्तजनों के दुखों को हर रहे हों। श्रद्धालुओं के अनुसार, श्री बालाजी महाराज के मंदिर परिसर में एक विशेष ऊर्जा का संचार होता है, जो नकारात्मकता को नष्ट करने और आंतरिक शांति प्राप्त करने में सहायता करता है। यह भक्ति-भाव, श्रद्धा और आत्मसमर्पण की भावनाओं को जागृत करता है।
भक्तों के लिए श्री बालाजी महाराज का प्रांगण आत्मिक शांति व विश्वास ही नहीं, बल्कि शक्ति का वह स्रोत है जो उन्हें नवजीवन के पथ पर निरंतर अग्रसर करता है।
श्री बालाजी महाराज का प्राकट्य एक अविस्मरणीय चमत्कार का प्रतीक है। लगभग हजारों वर्ष पूर्व, प्रथम दशनामी शैव संप्रदाय के गोस्वामी ब्रह्मलीन महंत श्री रामपुरी जी महाराज ने 11 गाँवों के पंच पटैलों को एकत्रित कर, अरावली पर्वत की दो सुरम्य पहाड़ियों के बीच श्री बालाजी महाराज को भू-रूप में दृष्टिगोचर किया। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा, भक्ति एवं सनातन शास्त्रों के विधि-विधान के अनुसार सेवा, पूजा, अर्चना व आरती प्रारंभ की। तत्क्षण, महंत श्री रामपुरी जी महाराज ने अपनी पूर्ण निष्ठा और विश्वास के फलस्वरूप श्री भैरव बाबा और श्री प्रेतराज सरकार को भी उसी श्रृंखला में निकट अलग-अलग स्थानों पर प्रकट किया।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, श्री बालाजी महाराज का अपने बाल स्वरूप में स्वयं प्रकट होना किसी चमत्कार से कम नहीं था। धीरे-धीरे, श्री रामपुरी जी महाराज के स्वप्न का वृत्तांत आस-पास के ग्रामवासियों में फैल गया। श्री बालाजी महाराज के द्वार पर आस-पास के गाँवों के लोग दर्शन हेतु आने लगे। उनकी कृपा से भक्तजनों की मनोकामनाएँ पूर्ण होने लगीं और यह स्थल भव्य और विशाल रूप में विकसित हो गया।
वर्तमान महंत श्री श्री 1008 डॉ. श्री नरेश पूरी जी महाराज के पूर्ववर्ती महंतों की परंपरा में, प्रथम दशनामी शैव संप्रदाय के गोस्वामी ब्रह्मलीन महंत श्री रामपुरी जी महाराज के मार्गदर्शन में घाटा, मेहंदीपुर में श्री बालाजी महाराज ने अपने होने का आभास करवाया। अरावली पर्वत श्रृंखला के मध्य में बालाजी महाराज का बाल रूप ब्रह्मलीन महंत श्री रामपुरी जी महाराज को भू-रूप में दृष्टिगोचर हुआ। उनके सूक्ष्मदर्शी अवलोकन के चलते, श्री बालाजी महाराज का अनुष्ठान संपूर्ण सनातन शास्त्रों के विधि-विधान अनुसार किया गया। इसी दौरान श्री भैरव बाबा और श्री प्रेतराज सरकार को स्थापित किया गया।
श्री बालाजी महाराज का यह हृदयग्राही रूप आज भी भक्तों को विस्मित करता है। इस धार्मिक स्थल की एक विशेषता यह है कि श्री बालाजी महाराज के बाएँ वक्ष-स्थल से एक बारीक जलधारा निरंतर प्रवाहित होती है, जो प्रभु श्री राम और माता सीता के चरणों को स्पर्श करती हुई बालाजी महाराज के चरणों में बनी कुण्डी में एकत्रित होती है। यही जल भक्तों को चरणामृत के रूप में वितरित किया जाता है।
यह विस्मयकारी प्राकट्य रूप देश-प्रदेश से अनगिनत भक्तों को आकर्षित करता है, जो दर्शन, सवामणी आयोजन एवं इच्छापूर्ति के लिए यहाँ आते हैं। मंगलवार और शनिवार को यहाँ लक्खी मेले का आयोजन होता है, जिसमें श्री बालाजी महाराज की संध्या आरती के समय अपार जनसमूह एकत्रित होता है। सभी श्रद्धालुओं के कंठ से एक ही स्वर गूंजता है—
श्री बालाजी घाटा मेहंदीपुर महाराज की जय।
श्री बालाजी मंदिर का नया भव्य रूप
श्री बालाजी मेहंदीपुर मंदिर के विकास का महत्वपूर्ण कार्य ब्रह्मलीन महंत श्री 1008 गणेशपुरी जी महाराज ने प्रारंभ किया था, जिसे ब्रह्मलीन महंत श्री 1008 किशोर पूरी जी महाराज के नेतृत्व में आगे बढ़ाया गया। वर्तमान में डॉ. श्री नरेश पूरी जी महाराज के मार्गदर्शन में मंदिर का चतुर्दिक विकास और विस्तार हो रहा है। वर्तमान में किए जा रहे कार्य भक्तों को सुखद आश्चर्य का अनुभव कराते हैं।
मंदिर पहुँचने का मार्ग

श्री बालाजी महाराज के मंदिर पहुँचने के मार्ग (सभी प्रकार के परिवहन द्वारा)
सड़क मार्ग
जयपुर से लगभग 110 किलोमीटर, दिल्ली से 220 किलोमीटर, और आगरा से 135 किलोमीटर की दूरी पर है।
ट्रेन मार्ग
निकटतम रेलवे स्टेशन बांदीकुई जंक्शन है, जो मंदिर से लगभग 30 किलोमीटर दूर है।
हवाई जहाज मार्ग
जयपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से 110 किलोमीटर दूर स्थित है।